कोतमा स्वास्थ्य केंद्र बना ‘भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला’; सेडमैप के चयनित युवाओं का ‘कत्ल-ए-मेरिट’, बिना आर्डर वाले ‘बिना वर्दी के सिपाही’ दफ्तरों पर काबिज!
कोतमा (अनूपपुर)। अनूपपुर जिले के कोतमा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से भ्रष्टाचार की एक ऐसी ‘सड़ांध’ आ रही है, जिसने समूचे स्वास्थ्य महकमे को कलंकित कर दिया है। यहाँ नियमों की किताब को जला दिया गया है और ‘साहबों’ की मनमानी का नंगा नाच चल रहा है। आलम यह है कि जो युवा भोपाल जाकर, इंटरव्यू की अग्निपरीक्षा देकर, सेडमैप (CEDMAP) का वैध ‘ऑफर लेटर’ लेकर आए हैं, उन्हें गेट से भगाया जा रहा है; जबकि दफ्तरों के भीतर ‘अदृश्य शक्तियों’ के आशीर्वाद से ‘बिना आर्डर’ वाले अवैध लोग कुर्सियों पर फेविकोल की तरह चिपके हैं।
1. मेरिट की हत्या: भोपाल का ‘आदेश’ रद्दी, कोतमा की ‘सेटिंग’ पक्की?
पूरा मामला मध्यप्रदेश शासन की गरिमा को चुनौती दे रहा है। 18-20 दिसंबर को भोपाल में हुए साक्षात्कार के बाद 29 दिसंबर को जिन 467 युवाओं (कंप्यूटर ऑपरेटर व MTS) को नियुक्त किया गया, उनके भविष्य पर कोतमा में ‘भ्रष्टाचार का ताला’ जड़ दिया गया है।
कड़वा सवाल: अगर ‘पर्ची’ और ‘पहुँच’ पर ही नौकरियां बांटनी थी, तो प्रदेश के हजारों युवाओं को भोपाल बुलाकर तमाशा क्यों किया गया?
2. ‘अवैध’ कब्जेदार: आखिर ये लोग कौन हैं और इन्हें किसका वरदहस्त है?
कोतमा CHC में वर्तमान में जो लोग कंप्यूटर और फाइलों पर कुंडली मारकर बैठे हैं, उनकी स्थिति ‘बिन बुलाए बाराती’ जैसी है।
इनके पास न कोई चयन सूची है, न कोई नियुक्ति पत्र।
सुरक्षा में सेंध: बिना किसी आधिकारिक रिकॉर्ड के ये लोग सरकारी डाटा और मरीजों की जानकारी के साथ खेल रहे हैं। यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318 और 61 के तहत ‘धोखाधड़ी’ और ‘आपराधिक षड्यंत्र’ का सीधा मामला है।
3. बीएमओ और सीएमएचओ की ‘मूक’ भागीदारी या बड़ी हिस्सेदारी?
क्या कोतमा स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी और जिला स्वास्थ्य अधिकारी को यह नहीं दिख रहा कि उनके नाक के नीचे ‘अवैध’ कर्मचारियों की फौज खड़ी है? या फिर बकहो की तरह यहाँ भी ‘ऊपर तक खर्चा पहुँचाने’ का खेल चल रहा है?
कानूनी हंटर: लोक सेवक के रूप में कर्तव्य की अवहेलना करना और अपात्रों को संरक्षण देना BNS की धारा 201 के तहत दंडनीय अपराध है। साहब! याद रहे, कुर्सी हमेशा नहीं रहती, लेकिन कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं।
4. कलेक्टर साहब! क्या अनूपपुर में ‘जंगलराज’ है?
जिला प्रशासन की चुप्पी पर अब उंगलियां उठने लगी हैं।
क्या प्रशासन को उन युवाओं की लाचारी नहीं दिखती जो हाथ में सरकारी आर्डर लिए न्याय की भीख मांग रहे हैं?
क्या प्रशासन उन ‘अवैध’ कर्मियों का बायोडाटा सार्वजनिक करने की हिम्मत जुटा पाएगा?

