किसानो की कमर तोड़ रहा स्मार्ट मीटर कामर्शियल पंप कनेक्शन,हटाए जाने हेतु समाजसेवी की मांग
अनूपपुर/जिले का केल्हौरी गांव जहां के किसान मेहनत से आधुनिक खेती कर अपनी रोजी रोटी चला रहे थे आज वही किसान बिजली बिल के बोझ तले दब गए हैं। किसानों की पीड़ा से व्यथित जिले के वरिष्ठ समाज सेवी एवं शिक्षा विद जीतेन्द्र सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव एवं देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ ही ऊर्जा विभाग के मुख्य सचिव सहित जिले के कलेक्टर एवं विभाग की अधिकारियों को पत्र लिखते हुए कृषि कार्यों में लगे विद्युत पम्पों व लगाए गए स्मार्ट मीटर कमर्शियल किए गये कनेक्शन को तत्काल हटाए जाने की मांग की है।
‘मिनी पंजाब’ बना बिलों का श्मशान
केल्हौरी गांव जिसे कभी ‘मिनी पंजाब’ कहा जाता था वहां किसान आधुनिक खेती कर आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रहे थे लेकिन आज वही गांव बिजली विभाग की नीतियों के नीचे कराह रहा है। 30 साल से चल रही कृषि व्यवस्था को एक झटके में खत्म कर दिया गया। 20 हॉर्स पावर के पंप से सिंचाई करने वाले किसानों को अचानक ‘व्यापारी बना दिया गया। क्या खेत में फसल उगाना अब ‘कॉमर्शियल विजनेस’ हो गया है।
शिक्षाविद की चेतावनीः ‘यह अन्याय नहीं, खुला अत्याचार है’
जिले के वरिष्ठ समाजसेवी एवं शिक्षाविद जितेंद्र सिंह ने इस पूरे मामले को लेकर सीधे सत्ता के शीर्ष तक दस्तक दी है। उन्होंने पत्र लिखकर प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, ऊर्जा विभाग के आला अधिकारियों जिला प्रशासन से मांग की है कि कृषि कनेक्शन को तुरंत बहाल किया जाए, स्मार्ट मीटर और कॉमर्शियल टैग हटाया जाए। उनका साफ कहना है ‘किसानों पर थोपा गया यह आर्थिक अत्याचार किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
कागजों में राहत,जमीन पर लूट? या आर्थिक फंदा?
सरकार कहती है ‘किसानों को राहत दी जा रही है’लेकिन हकीकत यह है कि पहले बिल 5 हजार आता था अब बिल 30 हजार तक, यह राहत है या आर्थिक फंदा ? यह योजना है या अफसरों की मनमानी?क्या बिजली विभाग सरकार की नीतियों को ही ठेंगा दिखा रहा है? ऐसे में सवाल तो लाजमी है, क्या यह सरकारी योजना है या अफसरों की मनमानी? क्या किसानों को राहत देने का वादा सिर्फ कागजों तक सीमित है? क्या बिजली विभाग सरकार की नीतियों को खुली चुनौती दे रहा है।
किसानों का फूटा गुस्साः ‘खेती छोड़ने की नौवत’
विद्युत विभाग की इस प्रकार खुली लूट से आहत किसान खुलकर कहने को मजबूर है,कि हम बिल भरें या परिवार चलाएं? ऐसे हालात बना दिये जा रहे हैं की किसान खेती करना बंद कर दे अगर यहां सरकार की नीतियों से अन्नदाता ही हार मान जाए तो फिर ‘किसान हितैषी’ का नारा किसके लिए है? किसानों का साफ कहना है कि अगर यही हाल रहा तो खेती बंद करनी पड़ेगी। हम बिजली का बिल भरें या परिवार चलाएं? क्या सरकार हमें होती छोड़ने पर मजबूर कर रही है
‘स्मार्ट मीटर’ या नया वसूली मॉडल ?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस समय सरकार राहत की बात कर रही है, उसी समय जमीनी स्तर पर फैसले किसानों को बर्बादी की ओर धकेल रहे हैं। क्या ‘स्मार्ट मीटर’ के नाम पर नया राजस्व मॉडल तैयार हो रहा है? यह सिर्फ अनूपपुर नहीं अपितु पूरे मध्यप्रदेश के किसानों के लिए खतरे की घंटी है, अगर आज इस ‘स्मार्ट मीटर खेल’ पर रोक नहीं लगी,तो कल हर किसान इस जाल में फंसेगा। अब किसान की नजरें सरकार पर ही टिकी है, ऐसी स्थिति में सरकार इस लूट पर लगाम लगाएगी? या फिर अन्नदाता यूं ही सिस्टम की मार झेलता रहेगा? यह सिर्फ बिजली बिल का मामला नहीं है, यह उस सिस्टम का चेहरा है, जहां योजनाएं कागजों में जन्म लेती है और जमीन पर शोषण बन जाती हैं।

